रात का सन्नाटा
सिंघानिया सदन
रात के 2 बज रहे है, एक ऊँचे कमरे में कांच की दीवार के सामने एक आदमी खड़ा था। हाथ में जलती हुई सिगार… आँखें नीचे फैले पूरे शहर की रौशनी पर टिकी हुईं। तभी उसके फोन की रिंगिंग शांति को चीर देती है।
वो धीरे से कॉल रिसीव करता है।
“सर, शिप आधे घंटे में निकलने के लिए तैयार है। एक बार आकर चेक कर लीजिए, फिर शिप रवाना कर देंगे।
आदमी की आवाज़ धीमी, पर आदेश जैसी, “ठीक है… आता हूँ।”
कॉल कट। वो नज़रें खिड़की से हटाकर एक गहरी सांस लेता है, सिगार की राख झाड़ता है और कमरे से बाहर निकल जाता है।
जैसे ही मुख्य पोर्च के दरवाज़े खुलते हैं, उसके इंतज़ार में खड़ी काली SUVs की लाइन एक साथ रोशन हो उठती है। वो आगे वाली गाड़ी में बैठता है और उसके पीछे-पीछे चार से पाँच गाड़ियाँ और मूव हो जाती हैं।
बाहर रात में चमक रहा था ब्लैक ग्रेनाइट पर गोल्डन और कॉपर में उकेरा गया— “सिंघानिया सदन”। LED लाइट की वजह से वो नाम दूर तक चमक की तरह दिखाई दे रहा था। गाड़ियाँ उसी रोशनी को पीछे छोड़ती हुई तेज़ी से मुख्य सड़क की ओर बढ़ जाती हैं।
SUVs तेज़ी से पोर्ट के पास जाकर रुकती हैं।
आदमी दरवाज़ा खोलता है और सीढ़ियाँ उतरते ही सीधे उस विशाल शिप की ओर बढ़ता है। डेक पर चढ़कर वह हर एक डिटेल को ध्यान से चेक करता है—कार्गो, लिस्ट, सिक्योरिटी, सब कुछ।
सब ठीक देखकर वह नीचे आता है और अपने हाथ का हल्का-सा इशारा करता है। इशारा मिलते ही शिप धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगता है।
लेकिन तभी अचानक गनशॉट की आवाज़ हवा चीरती है।
एक गोली तीव्र गति से सीधे आदमी की ओर आती है, और वो पलक झपकते ही 90 डिग्री घूमकर उस बुलेट को चकमा दे देता है। गोली उसके कंधे के बिल्कुल पास से निकलकर पीछे ट्रक से टकराती है।
आदमी शांत चेहरे के साथ सीधा खड़ा होता है… और अगले ही सेकंड अपनी गन निकालकर उसी दिशा में फायरिंग शुरू कर देता है, जिधर से हमला हुआ था।
फिर चारों तरफ गोलियां बरसने लगती हैं।
उसके आदमी तुरंत कवर लेते हुए राउंड फायर करते हैं।
सामने से बिना रुके गोलियों की बौछार और इस तरफ से भी लगातार जवाबी फायरिंग। पूरा पोर्ट गोलियों की गूँज से भर जाता है।
तभी एक आदमी धीमे कदमों से आदमी के बिलकुल पीछे आकर रुकता है और भारी आवाज़ में कहता है, “अवधान सिंहानिया…" अपने आदमियों से कहो, गन नीचे कर दें… नहीं तो तुम गये, समझे?
अवदान पीछे खड़े आदमी की धमकी सुनता है, और उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक तिरछी मुस्कान फैल जाती है।
बिना मुड़े, बिना एक सेकंड गंवाए, वो पीछे खड़े आदमी के हाथ को पकड़कर इतनी तेजी से खींचता है कि वो आदमी अपना संतुलन खोकर गुलाटी खाते हुए ज़मीन पर जा गिरता है।
वो अवदान को अविश्वास से देख रहा था, और अवदान के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं। अवदान बड़ी सहजता से उसके हाथ से गन निकाल लेता है। वो गिरा हुआ आदमी कुछ समझने की कोशिश ही करता है कि गोली सीधी उसके माथे के बीच से निकल जाती है। वो वहीं ढेर हो जाता है।
अवदान उसके शव के पास बैठकर शांत आवाज़ में कहता है — “अवदान सिंहानिया के सिर पर गन नहीं रखनी चाहिए थी। मैं उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता
जो पीछे से वार करे। सामने से करते तो शायद बच जाते… लेकिन पीछे से वार? टच-टच-टच… बिल्कुल नहीं बख्शता मैं। और तुम्हारा भी वही हाल हुआ।”
तभी उसका एक आदमी भागता हुआ आता है, “सर, सारे के सारे खत्म हो गए।”
अवधान सिंघानिया दिखने में जितना ख़ूबसूरत, उतना ही खौफ़नाक। 6.2 फ़ुट की हाइट, ओलिव स्किन पर कटे-छँटे शार्प फीचर्स, और उसकी हनी-ब्राउन आँखें… जिनमें देखने की हिम्मत किसी में नहीं थी। क्योंकि अवधान जितना हैंडसम था, उतना ही क्रूर।
उसके ब्राउन बाल हवा में हल्के से बिखरकर उसके फोरहेड पर आ जाते हैं। वो धीमे से हाथ उठाकर बालों को पीछे करता है, हर मूवमेंट में एक ठंडा-सा एटीट्यूड, एक खतरनाक शांति।
और फिर, अवदान खड़ा होता है, कोट की धूल झाड़ते है और अपनी वही कोल्ड, डर जमा देने वाली आवाज़ में बोलता है । “ठीक है रोनित… इन सबको इनकी सही जगह पहुँचा दो। और साथ में एक मेसेज भी दे देना, कि अवदान को रोकने के लिए ऐसी बचकानी हरकतें नहीं की जातीं।”
रोनित हल्के से सिर झुकाता है—
“Yes, Sir.”
एक-एक कर सभी SUVs फिर से स्टार्ट होती हैं और
रात की खामोशी को चीरते हुए निकल जाती हैं। कुछ ही देर बाद पूरा काफ़िला सिंघानिया सदन के पोर्च में आकर रुकता है।
अवदान तेज़ कदमों से अपने रूम की ओर जा रहा था कि पीछे से एक नर्म लेकिन शिकायत भरी आवाज़ आई।
“अवदान! सुबह हो गई… और तुम अब आ रहे हो?”
अवदान रुकता है। हल्की-सी मुस्कान के साथ पीछे मुड़कर देखता है। “मोम, कुछ इंपॉर्टेंट काम था।”
जीविका सिंहानिया — अवदान की माँ। लकदक साड़ी, माथे पर सिंदूर और आँखों में हमेशा की तरह तेज़ चमक ओर उनके चेहरे पर वही रॉयल शान और उसी के साथ हल्की झुंझलाहट।
“ठीक है, ठीक है… जानती हूँ तुम्हारे ‘इंपोर्टेंट काम’,”
वो आंखें घुमाती हुए कहती है। “जाओ, फ्रेश हो जाओ। आज तुम मेरे साथ मंदिर चलोगे। क्योंकि आज हमारी तरफ से कान्हा जी का श्रृंगार है, और हमें श्रृंगार आरती में जाना है।”
अवदान हाथ पीछे बाँधकर आराम से कहता है, मोम, सामान भेज दिया है ना? तो फिर टेंशन क्यों ले रही हो?
जीविका तुरंत पलटकर बोलती है, मैं टेंशन नहीं ले रही हूँ! मुझे खुद देखना है कि मेरे कान्हा जी मेरे सिलेक्ट किए हुए कपड़ों में कैसे लगेंगे।
उसके चेहरे पर साफ़ excitement चमक रहा था। वो जैसे खुद बच्चों जैसी हो गई थी। “समझे? तो तुम चल रहे हो ना मेरे साथ?”
अवदान हल्की सी सांस छोड़ते हुए बोलता है, ओके मोम… as you wish. आपके कान्हा जी को देखने चलेंगे। लेकिन पहले मुझे फ्रेश होना है।”
जीविका तुरंत सिर हिलाती है। ठीक है। आरती का समय 7 बजे है, तो तुम नीचे जल्दी आ जाना और—”
अवदान उसकी बात बीच में ही काट देता है ओर अचरज के साथ उन्हें देखता है “और क्या?”
जीविका उसे एक सेकंड देखती है… फिर गहरी सांस लेकर धीमे से कहती है, “और… आरती तुम्हें करनी है।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा-सा छा जाता है। अवदान उसे घूरकर देखता है, जैसे सोच रहा हो “सीरियसली?”
फिर खुद ही एक लंबी सांस लेता है। स्माइल के साथ बोला “ठीक है…” “अब मैं फ्रेश हो लूँ, मोम?”
“हाँ, ठीक है।” जीविका के चेहरे पर तुरंत खुशी आ जाती है। वो संतोष भरी मुस्कान के साथ कमरे से बाहर चली जाती है।
अवदान हल्के से सिर हिलाता है, अब उसे पता है कि बहस करने का कोई फायदा नहीं। जीविका ने एक बार डिसाइड कर लिया, तो फिर पूरा प्लान, पूरी तैयारी… सब पहले से रेडी करके रखती है। मतलब आज उसकी बात माननी ही पड़ेगी। वो बाथरूम की ओर बढ़ जाता है
, क्योंकि अब उसके पास मानने के अलावा कोई चॉइस नहीं थी।
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