
वह दायीं ओर एक धीमा-सा कदम बढ़ाती है, फिर बायीं ओर उसके लंबे वॉलनट-ब्राउन बाल हल्के-से पीछे झूलते हैं, दीपक की रोशनी उनमें चमकती है।
किष्ना दोनों हाथ ऊपर उठाती है, कलाईयाँ नरम, उंगलियाँ कमल-कलिका जैसी। वह एक बड़ा सा गोल अर्ध-चक्र बनाती है, जैसे आकाश में तीनों लोकों की छवि खींच रही हो। उसका दायाँ पैर पीछे जाता है और वह आधा घूमकर सामने आती है।
भक्ति विवश एक प्रेम पुजारिन,
फिर भी दीप जलाये रही है ।
किष्ना धीरे से आगे झुकते हुए दोनों हाथ राधा-कृष्ण की मूर्ति की ओर बढ़ाती है,वह दायीं हथेली में कल्पना का दीपक धरे हुए-सी मुद्रा बनाती है। कलाई को नर्म घुमाकर लौ का इशारा करती है। फिर धीरे-धीरे ऊपर उठाकर ज्यों आरती की घुमावदार लय में हाथ गोल करती है।
कृष्ण को गोकुल से राधे को...
कृष्ण को गोकुल से राधे को,
बरसाने से बुलाय रही है ।
दोनों करो स्वीकार कृपा कर,
जोगन आरती गाये रही है ।
दोनों करो स्वीकार कृपा कर,
जोगन आरती गाये रही है ।
किष्ना दायीं ओर एक सुंदर तिरछा स्टेप लेती है, बायाँ हाथ कंधे तक उठाकर कन्हैया को बुलाने का इशारा करती है अब वह बायीं ओर कदम बढ़ाती है, हल्का घूम, फिर कमर से एक ग्रेसफुल लहर जैसा मूवमेंट, और हाथों को कोमलता से आगे फैलाती है, जैसे बरसाना की राधा को प्रेम से बुला रही हो। किष्ना दोनों हाथ जोड़कर एक धीमी-सी परिक्रमा करती है। उसकी चूड़ियों की खनक ओर पायलें रुनझुन करती हैं।
भोर भये ते सांज ढ़ले तक,
सेवा कौन इतनेम म्हारो ।
किष्ना दोनों हाथों को आगे पीछे लहराती है, उसके कदम छोटे और हल्के, मंदिर की धूल को सम्मान देते हुए।
स्नान कराये वो वस्त्र ओढ़ाए वो,
भोग लगाए वो लागत प्यारो ।
पहले दायाँ हाथ ऐसे घुमाती है जैसे स्नान करवाती हो, फिर बायाँ हाथ वस्त्र ओढ़ाने के संकेत में कंधे से नीचे की ओर लहराता है। किष्ना अपने दोनों हाथों को हल्की कटोरी की आकृति बनाकर आगे ले जाती है, जैसे भगवान को भोग अर्पित कर रही हो।
कबते निहारत आपकी ओर...
कबते निहारत आपकी ओर,
की आप हमारी और निहारो ।
यहाँ वह रुक जाती है, धीरे से सिर एक तरफ झुकाती है, आँखें राधा-कृष्ण की मूर्तियों पर टिक जाती हैं।
राधे कृष्ण हमारे धाम को,
जानी वृन्दावन धाम पधारो ।
राधे कृष्ण हमारे धाम को,
जानी वृन्दावन धाम पधारो ।
किष्ना दायीं ओर घूमकर दोनों हाथों को पूरी गरिमा के साथ ऊपर उठाती है, उंगलियाँ आसमान की ओर फिर घुमकर एक सुंदर-सी अर्ध-चकरी करती है। उसके बाल घूमते हुए लहराते हैं। उसके कदम ठहरकर सही पोज़ में आ जाते हैं। साँस धीमी… चेहरा चमकता हुआ… और आँखों में अनोखी आस्था
🌼 डांस खत्म होते ही
किष्ना धीरे से आगे बढ़ती है। थाली से मोरपंख उठाती है। भगवान के सामने रुककर गहरी साँस लेती है, मंदिर में फैलती चंदन और फूलों की खुशबू उसे घेर लेती है।
और फिर… बहुत आदर के साथ वह मोरपंख किष्ना जी के मुकुट पर रख देती है। उसकी आँखों में चमक, जैसे श्रृंगार पूरा नहीं हुआ, एक साधना पूरी हुई हो।
लाइक और कमेंट्स जरूर करें।
वह दायीं ओर एक धीमा-सा कदम बढ़ाती है, फिर बायीं ओर उसके लंबे वॉलनट-ब्राउन बाल हल्के-से पीछे झूलते हैं, दीपक की रोशनी उनमें चमकती है।
किष्ना दोनों हाथ ऊपर उठाती है, कलाईयाँ नरम, उंगलियाँ कमल-कलिका जैसी। वह एक बड़ा सा गोल अर्ध-चक्र बनाती है, जैसे आकाश में तीनों लोकों की छवि खींच रही हो। उसका दायाँ पैर पीछे जाता है और वह आधा घूमकर सामने आती है।
भक्ति विवश एक प्रेम पुजारिन,
फिर भी दीप जलाये रही है ।
किष्ना धीरे से आगे झुकते हुए दोनों हाथ राधा-कृष्ण की मूर्ति की ओर बढ़ाती है,वह दायीं हथेली में कल्पना का दीपक धरे हुए-सी मुद्रा बनाती है। कलाई को नर्म घुमाकर लौ का इशारा करती है। फिर धीरे-धीरे ऊपर उठाकर ज्यों आरती की घुमावदार लय में हाथ गोल करती है।
कृष्ण को गोकुल से राधे को...
कृष्ण को गोकुल से राधे को,
बरसाने से बुलाय रही है ।
दोनों करो स्वीकार कृपा कर,
जोगन आरती गाये रही है ।
दोनों करो स्वीकार कृपा कर,
जोगन आरती गाये रही है ।
किष्ना दायीं ओर एक सुंदर तिरछा स्टेप लेती है, बायाँ हाथ कंधे तक उठाकर कन्हैया को बुलाने का इशारा करती है अब वह बायीं ओर कदम बढ़ाती है, हल्का घूम, फिर कमर से एक ग्रेसफुल लहर जैसा मूवमेंट, और हाथों को कोमलता से आगे फैलाती है, जैसे बरसाना की राधा को प्रेम से बुला रही हो। किष्ना दोनों हाथ जोड़कर एक धीमी-सी परिक्रमा करती है। उसकी चूड़ियों की खनक ओर पायलें रुनझुन करती हैं।
भोर भये ते सांज ढ़ले तक,
सेवा कौन इतनेम म्हारो ।
किष्ना दोनों हाथों को आगे पीछे लहराती है, उसके कदम छोटे और हल्के, मंदिर की धूल को सम्मान देते हुए।
स्नान कराये वो वस्त्र ओढ़ाए वो,
भोग लगाए वो लागत प्यारो ।
पहले दायाँ हाथ ऐसे घुमाती है जैसे स्नान करवाती हो, फिर बायाँ हाथ वस्त्र ओढ़ाने के संकेत में कंधे से नीचे की ओर लहराता है। किष्ना अपने दोनों हाथों को हल्की कटोरी की आकृति बनाकर आगे ले जाती है, जैसे भगवान को भोग अर्पित कर रही हो।
कबते निहारत आपकी ओर...
कबते निहारत आपकी ओर,
की आप हमारी और निहारो ।
यहाँ वह रुक जाती है, धीरे से सिर एक तरफ झुकाती है, आँखें राधा-कृष्ण की मूर्तियों पर टिक जाती हैं।
राधे कृष्ण हमारे धाम को,
जानी वृन्दावन धाम पधारो ।
राधे कृष्ण हमारे धाम को,
जानी वृन्दावन धाम पधारो ।
किष्ना दायीं ओर घूमकर दोनों हाथों को पूरी गरिमा के साथ ऊपर उठाती है, उंगलियाँ आसमान की ओर फिर घुमकर एक सुंदर-सी अर्ध-चकरी करती है। उसके बाल घूमते हुए लहराते हैं। उसके कदम ठहरकर सही पोज़ में आ जाते हैं। साँस धीमी… चेहरा चमकता हुआ… और आँखों में अनोखी आस्था
🌼 डांस खत्म होते ही
किष्ना धीरे से आगे बढ़ती है। थाली से मोरपंख उठाती है। भगवान के सामने रुककर गहरी साँस लेती है, मंदिर में फैलती चंदन और फूलों की खुशबू उसे घेर लेती है।
और फिर… बहुत आदर के साथ वह मोरपंख किष्ना जी के मुकुट पर रख देती है। उसकी आँखों में चमक, जैसे श्रृंगार पूरा नहीं हुआ, एक साधना पूरी हुई हो।
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