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किष्ना का नृत्य अपने सौंदर्य की पराकाष्ठा पर था, उसके पायल की रुनझुन, अनारकली की हल्की लहर, कमर तक आते वॉलनट-ब्राउन बालों का हर उठान… और दीपक की सुनहरी झिलमिल में चमकती उसकी हेज़ल आँखें, पूरे मंदिर में जैसे कोई सौम्य अग्नि नृत्य कर रही हो।

उसी समय… मंदिर के भारी लकड़ी वाले दरवाज़े धीरे से खुले। अवदान और जीविका अंदर आते हैं।

जीविका जैसे ही अंदर पहुँची, उसके कदम तुरंत रुक जाते हैं… लेकिन अवदान वह तो उसी क्षण ठहर गया
जिस क्षण उसकी आँखों ने किष्ना को देखा।

वह डांस के ठीक बीच में थी, दोनों हाथ ऊपर उठे हुए, दीपक की लौ पीछे से चमक रही थी, उसका चेहरा भक्ति में डूबा हुआ, और उसकी आँखें… जैसे किसी दूसरे लोक का सौंदर्य समेटे खड़ी हों।

अवदान के लिए जैसे सब कुछ धीमा हो गया। घंटी की आवाज़, पायल की रुनझुन, गीत की झंकार, सब मानो पिघलकर गायब हो गया। वह बस उसे देख रहा था। उसने एक बार भी पलकें नहीं झपकीं। एक भी नहीं।

किष्ना के बाल जब घूमते हुए उसके गालों को छूते, अवदान का दिल अनजाने में उनका पीछा करता।
उसके कदमों की थिरकन, उसकी कमर का हल्का-सा घूमना, उसकी हथेलियों की मुद्रा— सब अवदान की साँसों पर कब्ज़ा कर चुके थे।

जीविका ने अवदान की तरफ देखा, वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था। जैसे उसके पैरों को किसी ने जमीं से बाँध दिया हो। चेहरा शांत… पर आँखें? वो तो साफ़ बता रही थीं कि वह किसी गहरे जादू में बँध चुका है।

डांस अपने आखिरी चक्र में पहुँचा, किष्ना धीमे-धीमे घूमी, उसके बाल हवा में उठे, आँखें हल्का-सा बंद… और अंतिम मुद्रा में आकर रुकी।

डांस खत्म होते ही किष्ना अपनी जगह स्थिर हुई। वह हल्का-सा सिर झुकाकर मुस्कुराई… दीपक की लौ उसके पीछे ऐसे चमकी मानो उसके लिए ही जग रही हो। और अवदान की सांसों का रुका हुआ प्रवाह अचानक चल पड़ा।

जीविका ने अवदान की तरफ देखा, वह अभी भी उसे देख रहा था, बिना किसी झिझक, बिना किसी हिचक।
जीविका तुरंत समझ गई। वह हल्के से उसके शोल्डर पर टेप मारती है।

अवदान हल्का-सा झटका खाता है, अवदान जैसे नींद से जागा हो, हल्का-सा चौंका, और फिर नजर झटके से किष्ना से हटाकर जीविका की तरफ की।

जीविका ने भौंहें उठाकर कहा, “चलो… आरती करनी है।”

वह नज़र तुरंत किष्ना से हटाता है, चेहरा फिर से सामान्य… बिल्कुल शांत। जैसे अभी कुछ हुआ ही नहीं।
वह आगे बढ़ता है, पूजा की थाली को उठाता है, और पूरी मर्यादा के साथ आरती शुरू कर देता है।

उसके चेहरे पर एक ऐसी स्थिरता थी, कि जिसे देखकर कोई भी यकीन नहीं करेगा। कुछ क्षण पहले यही आदमी किसी लड़की के नृत्य में पूरी तरह खो गया था। "जो अब उसके चेहरे को देख कोई नहीं कह सकता कि ये वही शख्स था या कोई कह दे कि वो सब शायद एक भ्रम था," तो भी किसी को झूठ नहीं लगेगा।

आरती पूरी होते ही पंडित जी एक-एक कर सबको आरती करवाते हैं और प्रसाद बांटते हैं। धूप की खुशबू, घंटियों की मधुर आवाज़ और राधा–कृष्ण के सजे हुए रूप से पूरा मंदिर जगमगा रहा था।

जीविका और अवदान भी प्रसाद लेते हुए एक ओर खड़े होते हैं। पंडित जी जीविका की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोले, बेटा, आपके द्वारा भेजी गई श्रृंगार की पूरी सामग्री बहुत ही सुंदर थी… देखिए, राधा-कृष्ण कितने प्यारे लग रहे हैं आज।

जीविका विनम्रता से मुस्कुराती है, पंडित जी, राधा-कृष्ण तो खुद ही मनमोहक हैं… और जिसने प्यार से श्रृंगार किया, सामग्री तो अपने आप निखर कर आ गई।

पंडित जी संतोष से सिर हिलाते हैं, “ये तो तीनों बच्चियों की मेहनत है।”

जीविका एक पल को रुकती है, “तीन बच्चियाँ?”

पंडित जी सहज भाव से बताते हैं, “हाँ बेटी— वेदिका, मीरा और किष्ना।”

जीविका की आँखें हल्की-सी सिकुड़ती हैं, “किष्ना… वही जो अभी डांस कर रही थी?” उसकी आवाज़ शांत थी, पर भीतर गहरी उत्सुकता छिपी हुई।

“हाँ,” पंडित जी मुस्कुराकर बोलते हैं, वही है किष्ना गोयंका। गोयंका इंडस्ट्रीज़ के मालिक की बेटी।

जीविका कुछ पल बिल्कुल स्थिर खड़ी रहती है। चेहरे पर किसी भी भावना की लकीर नहीं… बस एक शांत, नियंत्रित-सी अभिव्यक्ति।

वह धीरे से सिर झुकाती है—
“अच्छा… अब आज्ञा दीजिए पंडित जी।”

“अशीर्वाद है, बेटी।” पंडित जी मुस्कुराते हैं।

जीविका भी हल्की-सी मुस्कान लौटाती है, पर उसके मन में कुछ और ही चल रहा था…

मंदिर की भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी थी।
दीपों की लौ अब भी हवा में हल्की-हल्की थिरक रही थी…
लेकिन अवदान की आँखों में बस एक ही छवि अटकी हुई थी, किष्ना का नृत्य… उसकी हेज़ल आँखें… वो मासूम-सा भाव।
अवदान ने बिना पलक झपकाए मोहित की तरफ देखा और ठंडी, सधी हुई आवाज़ में बोला “मुझे इस लड़की की… पूरी इनफॉर्मेशन चाहिए। हर चीज़ ओर आज ही।”

मोहित तुरंत सीधा खड़ा हो गया, “Yes, sir. शाम तक सब मिल जाएगा।” अवदान बस हल्का-सा सिर हिलाता है।

अवदान की आँखें अभी भी मंदिर के अंदर की तरफ जमी थीं, जैसे उसके भीतर कोई नया खेल शुरू हो चुका हो।

उसी वक़्त जीविका वहाँ आकर खड़ी होती है।
वह शांत आवाज़ में पूछती है, “चलें?”

अवदान ने एक झटके में खुद को संयत किया, अपने मन की हलचल को चेहरे से मिटाते हुए बस हाँ में सिर हिला दिया।  दोनों मंदिर से बाहर निकल गए।

गोयंका मेंशन
किष्ना की दुनिया

दूसरी ओर… किष्ना गाड़ी से उतरकर जैसे ही गोयंका मेंशन के भव्य हॉल में दाख़िल हुई, एक तेज़ आवाज़ ने उसके कदमों को जड़ कर दिया।
एक बड़ा-सा महँगा वास उसके बिलकुल सामने
ज़ोर से ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। टुकड़े उसके पैरों से बस कुछ इंच दूर थे। किष्ना का चेहरा एक पल में सफ़ेद पड़ गया। सांस सीने में अटक गई।

सामने से भारी, कठोर आवाज़ गूँजी, “तुम्हें पता है… मुझे मेरी ब्लैक कॉफी समय पर चाहिए होती है।” मि. प्रनीत धीमे-धीमे कदम बढ़ाते हुए सामने आए, उनकी आँखों में वही तेज़, डराने वाला गुस्सा।
“और आज वो नहीं आई। और ये काम… ये ज़िम्मेदारी…” वो पास आकर रुकते हैं, "तुम्हारी थी। अगर मैं गलत नहीं हूँ तो?”

किष्ना के गले से शब्द निकल ही नहीं रहे थे। उसने घबराकर सिर झुका लिया, हाथ काँप रहे थे… “जी… वो… मैं… मैं अभी लाती हूँ…”उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे हवा में ही खो जाए।

प्रनीत ने नफरत भरी नजरों से उसे देखा ओर कहता है तुमसे एक काम भी ठीक से नहीं होता। अब जाओ— फ़ौरन यहां से!”

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