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Pranit ka gussa

प्रनीत का ग़ुस्सा कमरे की हवा को काटता हुआ सीधा कृष्णा के सीने में उतर गया।

किष्ना की आँखे झटके से भर आईं। होंठ काँपे… पर आवाज़ नहीं निकली। वो जल्दी से पीछे हटी, दुपट्टा सँभालते हुए लगभग भागती हुई किचन में पहुँची।

किचन की स्लैब के सहारे खड़े होकर उसने गहरी साँस लेने की कोशिश की पर हाथ अब भी काँप रहे थे।

थाली में रखी कॉफी मग उठाया, चम्मच से ब्लैक कॉफी मिलाते हुए उसके हाथों की कंपकंपी और तेज़ हो गई।
उबलती भाप उसके चेहरे से टकराई… फिर भी उसने अपने आँसू रोक कर कॉफी ट्रे में रखी और धीरे-धीरे बाहर चली गई।

प्रनीत सोफ़े पर बैठा था, एक हाथ में फ़ोन… चेहरे पर वही सख़्त, ठंडी नज़र।

किष्ना ने उसके सामने ट्रे रखी। उससे पहले कि वह कुछ कहे, प्रनीत की आवाज़ फिर गूँजी, “कहाँ गयी थी तुम सुबह-सुबह?”

किष्ना ने नज़रें झुका लीं। आवाज़ इतनी धीमी कि जैसे हवा भी सुन ले तो चीख जाए, “वो… मैं मंदिर गयी थी।”

प्रनीत ने तिरछी नज़र से उसे देखा, भौंहें सिकुड़ गईं, “मंदिर गयी थी… या नाचने?”

  किष्ना की साँस रुक गई। चेहरे पर हैरानी… जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। उसके होंठ फड़फड़ाए— “मैं… मैं तो मंदिर ही गयी थी…”

प्रनीत ने फ़ोन स्क्रीन उसके सामने घुमा दी। थोड़ी दूरी पर खड़े होकर भी किष्ना उस वीडियो को पहचान गई, वही… मंदिर में किया हुआ उसका डांस। वो पल… जिसकी खबर उसने सोचा था किसी को नहीं होगी।

प्रनीत की आवाज़ एक कटती हुई तलवार जैसी थी, “अच्छा? तो ये क्या है? तुम्हारा भूत है… जो तुम्हारे शरीर से निकलकर नाचने चला गया था?”

  किष्ना का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।कॉफी का कप उसके हाथ में काँपा, कुछ बूंदें छलक कर फ़र्श पर गिर पड़ीं। वो कुछ बोलना चाहती थी…पर शब्द गले में ही अटक गए।

  किष्ना  ने काँपते हाथों से आँचल थाम लिया। आँखों में डर, गले में अटकी सिसकी। धीरे से बोली, न…नहीं… ये तो मैं ही हूँ… वो तो… कान्हा जी का गाना बजा… तो मुझे पता ही नहीं चला…कब मैं… डांस करने लगी…”

उसकी आवाज़ टूट गई। वो खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि अपनी सफ़ाई दे रही है… या खुद को समझा रही है।

प्रनीत ने ठंडी, कड़ी नज़र से उसे देखा, फ़ोन मे से चलती वीडियो की रोशनी उसके चेहरे को और भयानक बना रही थी।

“अच्छा… तो कान्हा जी का गाना सुनकर तुम खुद को रोक ही नहीं पाई?” वो एक कदम आगे बढ़ा, कप उसके हाथ से छीनकर टेबल पर पटकर, तो सुनो… आज से मंदिर जाना ही बंद!”

कृष्णा का दिल जैसे धड़कना भूल गया। उसने घबराकर तुरंत हाथ जोड़ लिए — आँखों से आँसू बहते हुए उससे पहले कुछ बोला जाए।

“नहीं… ऐसा मत कीजिए… मैं अब कभी डांस नहीं करूँगी… कभी नहीं… बस… बस मुझे मेरे कान्हा जी से दूर मत कीजिए, प्लीज़… प्लीज़… मुझे मंदिर जाने दीजिए…”

वो उसके पैरों के पास घुटनों के बल गिर गई। हाथ जोड़कर, रोते हुए, हिचकियाँ लेते हुए कहा मुझे मेरे कान्हा से दूर मत कीजिए… मैं मर जाऊँगी… सच में मर जाऊँगी…”

कमरा उसकी सिसकियों से भर गया। पर प्रनीत की निगाहों में न नरमी थी, न पिघलाव… बस कड़वाहट।

उसने तिरस्कार से उसे देखा और एक-एक शब्द चीरते हुए बोला तो जा… जा के मर जा कहीं। वैसे भी जीना हराम कर रखा है तुमने।

      किष्ना की साँस रुक गई। ज़मीन उसके नीचे और दिल उसके भीतर दोनों एक साथ टूट गए। किष्ना ज़मीन पर गिड़गिड़ाती हुई रो ही रही थी कि तभी पीछे से एक नरम लेकिन मजबूत हाथ उसके कंधे पर आया।

मीनाक्षी किष्ना की चाची… और प्रनीत की पत्नी।वो झुककर उसे पकड़ती है, बड़े प्यार से उसे खड़ा करती है।अरे, कृष्णा… क्या कर रही हो तुम?
फिर वह प्रनीत की तरफ मुड़कर गुस्सा दबाते हुए बोली, प्रनीत, तुम भी ना… इतनी-सी बात पर इतना गुस्सा? एक डांस ही तो किया था उसने… वो भी मंदिर में! कहीं बाहर नाचती तो समझ आता… पर ये?

किष्ना डर के मारे कंप रही थी, आँसू पोंछ भी नहीं पा रही थी। बस दबे हुए स्वर में “हाँ चाची…” कहकर सिर झुका लिया।

मीनाक्षी ने उसके सिर पर हल्का-सा हाथ फेरा आँखों में माँ-सी नरमी थी। “ठीक है बिटिया… जाना तुम्हें मंदिर? कल चली जाना। अभी जाओ… अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आराम करो।”

किष्ना ने काँपती साँसों के बीच सिर हिलाया “जी…”और धीरे-धीरे कमरे की ओर चली गई। उसके कदम इतने हल्के थे जैसे ज़मीन भी उसे बोझ समझने लगी हो।

पीछे प्रनीत की नज़रें अब भी आग की तरह जल रही थीं, कभी दरवाज़े की तरफ जहाँ किष्ना गई… कभी मीनाक्षी की तरफ।

मीनाक्षी ने उसकी आँखों में देखते हुए धीमे लेकिन सख़्त स्वर में कहा, मंदिर ही तो गई थी वो। और डांस भी वही किया था…तो क्या इतना ज़्यादा गुस्सा करने की ज़रूरत थी?”
वह आगे बढ़कर उसके हाथ से कप उठाती है।“डांस कर रही होगी… किसी ने वीडियो बना ली होगी। बच्ची है, गलती से हो गया होगा।”

प्रनीत कुछ बोलने ही वाला था कि मीनाक्षी ने बात बदल दी, जैसे उसे पता था कि आगे क्या ज़हर निकलेगा। “चलो… ये सब छोड़ो।" उसका हाथ धीरे से प्रनीत के बाजू पर रखा। मैं तुम्हारे लिए अच्छी-सी कॉफी बनाकर लाती हूँ। तुम भी थोड़ा मूड ठीक करो।

वो एक हल्की-सी मुस्कान में गुस्सा छिपाती हुई किचन की तरफ मुड़ गई।

कमरे में बस प्रनीत की ठंडी, चुभती हुई आँखें रह गईं, जो उस दिशा में देख रही थीं जहाँ कुछ पल पहले किष्ना भय से काँपती हुई चली गई थी।

कृष्णा धीरे-धीरे अपने कमरे तक पहुँचती है।
दरवाज़ा बंद करते ही उसका पूरा शरीर ढीला पड़ जाता है

वो पीठ दरवाज़े से टिकाकर नीचे फिसल जाती है…
और बस ज़मीन पर बैठ जाती है।

एक ठंडी सिसकी उसके होंठों से निकलती है—
और फिर आँसू रुकने का नाम नहीं लेते।

वो धीरे-धीरे खुद से ही बड़बड़ाती है—
टूटी हुई आवाज़ में…“में… में तो बस मंदिर ही गई थी…”
एक और सिसकी। “मैंने कुछ गलत नहीं किया…”

उसके हाथ अनजाने में गर्दन का पेंडेंट पकड़ लेते हैं—
वो छोटा-सा मोरपंख, जो उसके कान्हा की याद दिलाता था।

वो उसे सीने से लगा लेती है
जैसे वही उसकी आखिरी ताकत हो।
सांसें अनियंत्रित थीं—
धीमी, टूटती हुई।

आँखें बंद करके सिर दीवार से टिकाती है
और फुसफुसाती है—

“कान्हा… मैंने गलत नहीं किया ना?
आपके लिए ही तो नाची थी…”

आख़िरी बार मोरपंख को पकड़कर वो फुसफुसाती है।

“कृपया… मुझे मेरे कान्हा से दूर मत करना…”

और कमरे की खामोशी उसकी टूटी हुई प्रार्थना को
सुनकर बस सन्न रह जाती है।

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Desire ruksi

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