
अवदान के ऑफिस में
रात का समय था।
अवदान के ऑफिस की बड़ी खिड़की के बाहर शहर की लाइटें चमक रही थीं, लेकिन अंदर का माहौल बिल्कुल अलग— गहरा, शांत, और खतरनाक रूप से सन्नाटा भरा।
अवदान अपनी काली कुर्सी पर बैठा फाइलें देख रहा था,
पर उसका मन कहीं और ही अटका था…मंदिर के उस पल में… किष्ना के चेहरे की तस्वीर बार-बार उसकी सोच में लौट आती थी।
तभी दरवाज़ा खटखटाया गया।
मोहित अंदर आया। गंभीर चेहरा, हाथ में एक मोटी फाइल। “सर… वो जानकारी।” उसने फाइल टेबल पर रखी।
अवदान ने धीरे से नजर उठाई, ठंडी, तेज, मगर भीतर एक दबी हुई बेचैनी। “सब कुछ है इसके अंदर?” आवाज़ बिल्कुल सपाट।
“यस सर. पूरा बैकग्राउंड.”मोहित रिप्लाई देता है
अवदान ने फाइल खोली।
पहला पेज, एक फोटो।
किष्ना गोयंका। वही वॉलनट-ब्राउन बाल, वही डस्की स्किन, वही हेज़ल ब्राउन आँखें… पर इस फोटो में उसकी आँखें थकी हुई थीं। हँसी गायब थी।
अवदान अनजाने में फोटो पर उँगलियाँ फेरता है… जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।
मोहित धीरे से बोलता है, “सर, ये… सामान्य लड़की नहीं है। इसे देखिए, अवदान ने पन्ने पलटे।
किष्ना गोयंका — रिपोर्ट
• नाम: किष्ना गोयंका
• उम्र: 20 वर्ष
• पिता: स्वर्गीय देव गोयंका
• माता: स्वर्गीय सान्वी गोयंका
दोनो की मृत्यु एक साथ ही हुई थी
गोयंका मेंशन में प्रनीत गोयंका (चाचा) ओर मीनाक्षी उसकी चाची के साथ रहती हैं । उस घर में मीनाक्षी ही है जो अभी किष्ना गोयंका का सपोर्ट करती हैं।
• स्वभाव व व्यवहार लगातार मानसिक दबाव में रहती है, आत्मविश्वास की कमी, ज़्यादातर समय खामोश, किसी से ज़्यादा बात नहीं करती, डर, संकोच और असुरक्षा उसके व्यवहार में स्पष्ट
सोशली लाइफ में कोई दोस्त नहीं, बाहर जाने की परमिशन बहुत सीमित, पढ़ाई और निजी फैसलों पर पूरा नियंत्रण उसके चाचा का
रूटीन लाइफ रोज़ सुबह-सुबह मंदिर जाती है, मंदिर ही एकमात्र जगह है जहाँ उसे थोड़ी आज़ादी मिलती है, वहीं वह अकेले घंटों बैठती है, पूजा करती है, डांस उसका छुपा हुआ शौक है, जिसे वह केवल कान्हा के सामने ही व्यक्त कर पाती है क्योंकि उसके चाचा यानी प्रनीत गोयंका को उसका डांस करना पसंद नहीं है।
अवदान के माथे पर हल्की शिकन पड़ी। “Suppressive environment?”“दमनकारी माहौल?
उसने बुदबुदाया।
मोहित ने सिर हिलाया। जी सर… उसके अंकल ही सब कुछ कंट्रोल करते हैं—उसका फ़ोन, उसकी आवाजाही, यहाँ तक कि उसकी पढ़ाई भी। पड़ोस वालों का कहना है कि वो बहुत कम बोलती है… हमेशा डरी-डरी सी रहती है।
अवदान की उँगलियाँ फाइल पर थम गईं।
फिर एक और पेज, “प्रनीत गोयंका — बेहद नियंत्रण रखने वाला स्वभाव, गुस्सा तो नाक पे रहता है और यहां तक कि आज भी सुबह वो किष्ना गोयंका पर वास फेक कर मारने की कोशिश की थी लेकिन वो वास उनसे थोड़ी दुरी पर गिरा था।”
अवदान की निगाहें तेज हो गईं। एकदम नुकीली। “ये… मंदिर जाती है रोज़?” उसका स्वर थोड़ा धीमा पर गंभीर था।
“जी सर। वही इसका एकमात्र बाहर जाने का बहाना है।”
मोहित ने बताया।
अवदान ने फाइल बंद की। धीरे से… लेकिन आवाज ऐसी कि कमरे की हवा भी थम जाए। कुछ सेकंड का सन्नाटा… फिर मंदिर में उसने… डर नहीं दिखा।
सिर्फ शांति दिखी।” अवदान खुद से जैसे बात कर रहा था।
मोहित थोड़ा चौंका।
“सर?”
अवदान ने अपने शब्दों को बदला, “बस… फाइल छोड़ दो। वह मोहित की तरफ मुड़ा, आवाज़ सख्त, भारी “उसके चाचा… प्रनीत गोयंका…मुझे उसकी सारी इन्फोर्मेशन चाहिए”
मोहित तुरंत सीधा खड़ा हुआ,
“जी सर?”
अवदान ने दाँत भींचते हुए कहा, “उस आदमी की सारी गंदगी खोद निकालो… हर सच… हर राज़… हर जुर्म… मुझे सब चाहिए। और अगर उसने उसे ज़रा-सा भी हाथ लगाया है…तो मैं उसकी दुनिया जला दूँगा।”
मोहित yes सर कहकर रूम से बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
ऑफिस फिर शांत। अवदान कुर्सी पर पीछे झुककर बैठ गया, और फाइल का नाम धीरे से पढ़ा किष्ना गोयंका।
उसकी आँखों में वही मंदिर की छवि लौट आई, किष्ना की आँखों की चमक, उसका मासूम भक्ति से भरा नृत्य,
वो पायल की रुनझुन… और वो पल जब दोनों की आँखें एक पल को टकराई थीं।
अवदान ने एक लंबी सांस ली। उसकी आँखों में पहली बार एक अलग-सी चमक थी, ना गुस्सा, ना ठंडापन…
बल्कि कुछ ऐसा जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।
और उसने धीरे, बेहद धीमी आवाज़ में कहा "डिजायर "
जैसे यह नाम ही अब उसकी जिज्ञासा नहीं, उसकी बेचैनी बन चुका हो। जैसे इस नाम ओर चेहरा उसकी ख्वाहिश बन रहा है जो वो किसी भी तरीके से उसे अपने करीब रखना चाहता हो।
वही दूसरी ओर किष्ना को पता ही नहीं चला कि कब रोते-रोते उसका सिर दीवार से टिक गया था और कब आँखें भारी पड़कर बंद हो गई थीं। ठंडी फ़र्श पर लेटे-लेटे उसकी साँसें सूखी हुई थीं… गाल अब भी आँसुओं की नमी से चिपके थे।
कमरे की घुटी हुई हवा, बंद दरवाज़ा, और भीतर गूँजता हुआ वही डर—सब वैसा ही था।
उसी समय बाहर से एक धीमी-सी खटपट हुई,
फिर मीनाक्षी की नर्म आवाज़, “किष्ना बच्चा? कैसी हो?”
किष्ना ने पलकों को मुश्किल से उठाया। आवाज़ में ममता थी… चिंता भी… पर किष्ना का गला जैसे जाम हो चुका था।
मीनाक्षी फिर बोलीं, इस बार थोड़ा आग्रह करते हुए, चलो नीचे आ जाओ… खाना खा लो। सुबह से कुछ नहीं खाया है तुमने। चल आजा नीचे जल्दी, बेटा।
किष्ना ने अपने सिर पर हाथ रखा… हल्का दर्द धड़क रहा था।शायद ज़्यादा रोने से…या शायद उस vase फेंके जाने के डर से जो अब भी कानों में आवाज़ की तरह गूंज रहा था।
वह दरवाज़े की तरफ देखती है… उसे पता है मीनाक्षी ही घर में एकमात्र इंसान है जो उसके लिए चिंतित रहती हैं।
लेकिन नीचे जाना…नीचे मतलब चाचा की आँखों का डर,
उनकी आवाज़…उनकी नजरें… उनका गुस्सा जो सुबह की तरह किसी भी पल फूट सकता है।
किष्ना ने होंठ भींचे… एक लंबी, धीमी साँस ली, “हाँ चाची… आती हूँ…” उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी लेकिन मीनाक्षी ने सुन लिया। उन्होंने राहत की साँस ली।
पर उसे नहीं पता कि उसी वक्त, कुछ मील दूर, एक आदमी, अवदान को उसकी यह टूटी नींद…
और यह ठंडा फ़र्श… किसी और में आग बन चुका है।
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