रो रो कर खुद की ओर चेहरे की हालत खराब कर रखी है तो किष्ना वॉशरूम में गई। चेहरे पर पानी मारा—ठंडा, सुन्न कर देने वाला, जैसे वह अपनी आँखों की सारी थकान वहीं धो देना चाहती हो। आँखों की लालिमा, रोने के निशान… उसने जल्दी से दुपट्टे से चेहरा पोंछा और खुद को थोड़ा सँभालकर वॉशरूम से बाहर निकली।
धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरती हुई नीचे आई। डाइनिंग हॉल में सन्नाटा था, बस मीनाक्षी टेबल पर बैठी उसका इंतज़ार कर रही थीं। “आ जा बेटा,” उन्होंने नरम आवाज़ में कहा।
दोनों चुपचाप खाना खाने लगे।किष्ना छोटे-छोटे कौर ले रही थी, जैसे हर निवाला गले से नीचे उतारना मुश्किल हो। मीनाक्षी उसे देखते हुए बस मन में सोच रही थीं—ये बच्ची आखिर कब चैन से मुस्कुराएगी…
और तभी…ज़ोर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़। भारी कदमों की धमक। गुस्से से भरी साँसें। अक्षत अंदर आया, तेज़, तमतमाया हुआ, और प्रवेश करते ही उसने अपना पैर टेबल पे मार देता है।
मीनाक्षी और किष्ना दोनों चौंककर उसकी तरफ देखने लगीं।
अक्षत, प्रनीत और मीनाक्षी का बेटा, किष्ना का कज़िन… लेकिन स्वभाव बिल्कुल अपने पिता जैसा, डरावना, हिंसक और तेज़ गुस्से वाला।
मीनाक्षी तुरंत उठीं, आवाज़ में चिंता और झुँझलाहट दोनों क्या हुआ अक्षत? ऐसे गुस्से में क्यों हो?
अक्षत ने गहरी, भारी सांस ली, बालों में हाथ फेरा, और दाँत भींचकर बोला, “G-K ने जीना हराम कर रखा है!
मीनाक्षी ने आँखें सिकोड़कर पूछा अब ये GK कौन है? और क्या किया है उसने तुम्हारे साथ?
अक्षत की मुट्ठियाँ कस गईं। उसके चेहरे की नसें तक तनी हुई थीं। उस GK ने… हमारा जो ड्रग्स का शिप निकलने वाला था… उसने ज़ोर से टेबल पर हाथ मारा…उसमें आग लगा दी! उस कुत्ते ने सब जला दिया!
किष्ना का हाथ सहमकर काँप गया। उसने अनजाने में अपनी चूड़ी को पकड़ा, डर उसके चेहरे पर साफ़ उतर आया था।
मीनाक्षी हिल गईं, तुम्हें कैसे पता कि ये सब GK ने किया?
अक्षत हँसा एक ठंडी, जहरीली हँसी, क्योंकि वो महाशय हर बार एक ही काम करते हैं। उसने जैकेट उठाकर जोर से फर्श पर फेंका। अपना एक निशान छोड़कर जाते हैं… GK… बड़े stylish बनते फिरते हैं।
मीनाक्षी कुछ बोल पाती उससे पहले अक्षत फिर गरजा इसलिए मुझे पता है कि ये उसी हरामी का काम है! समझीं आप?
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। किष्ना चुप… बिल्कुल चुप… लेकिन उसके अंदर एक नया डर जन्म ले रहा था।
किष्ना ने अपनी काँपती उँगलियाँ मेज के नीचे कसकर पकड़ीं और बहुत धीरे, बहुत शांत आवाज़ में बोली, शांत हो जाइए अक्षत भाई...कृष्णाजी सब ठीक कर देंगे। आप थोड़ा खाना खा लीजिए।
उसकी आवाज़ में कोई ताकत नहीं, बस विनती थी। मगर अक्षत के कानों में जाते ही जैसे आग भड़क उठी अचानक, अक्षत ने अपनी कुर्सी को ज़ोर से साइड में फेंक दिया। कुर्सी फर्श पर घिसटकर दूर जा गिरी।
और वह किष्ना पर चीखा, पूरा हॉल उसकी गरज से काँप उठा, “तू चुप कर! कुछ आता-जाता है नहीं तुझे! बैठे बैठे रोटियाँ तोड़ने के अलावा क्या करती है तू? किसी ने तुझसे पूछा है कि हमें क्या करना है?” वह और करीब झुका, उसकी नसें बाहर निकल आईं, आई बड़ी— किष्नाजी सब ठीक कर देंगी!
किष्ना का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसकी साँसें अटक गईं। उसने अपनी पायल को पकड़ा—अपने डर को छुपाने की आदत।
मीनाक्षी तुरंत बीच में बोल पड़ीं, अक्षत! शांत हो जाओ!
क्यों भड़क रहे हो उस पर? उन्होंने किष्ना की ओर देखा, थोड़ी नाराज़ी, थोड़ी चिंता, इसका जितना दिमाग चलेगा, उतना ही बोलेगी ना। इसे क्या पता… ड्रग्स क्या है, कारोबार क्या है।
फिर वे किष्ना से बोलीं, “और तुम… चुप रहो थोड़ी देर।
तुम्हें इन सब में पड़ने की ज़रूरत नहीं है।”
किष्ना सिर झुकाकर चुप बैठ गई। उसकी आँखों में नमी फिर उभर आई लेकिन उसने आँसू वहीं रोक लिए, रोना अब घर में भी गुनाह जैसा लगता था।
मीनाक्षी अक्षत की तरफ वापस मुड़ीं, आवाज़ को नरम बनाते हुए, चलो, अब शांत हो जाओ। खाना खा लो… तुम्हारा फेवरेट बनाया है।”
अक्षत ने कड़वी नज़र से उन्हें घूरा, कुँठा, गुस्सा, असफलता— सब चेहरे पर साफ।
मीनाक्षी ने उसका हाथ पकड़ लिया, धीरे, माँ की तरह, “चल… थोड़ा सा खा ले। मेरे लिए।”
अक्षत की साँसें थोड़ी धीमी हुईं… गुस्सा अभी भी था, लेकिन माँ के हाथ की पकड़ ने उसे कुछ पल के लिए रोक दिया।
कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया, बस किष्ना के दिल की धड़कनें तेज़ थीं…
अक्षत चम्मच प्लेट पर पटकते हुए खाना खाने की कोशिश कर रहा था, पर गुस्सा उसके हर अंदाज़ से टपक रहा था।
एक कौर मुँह में डालते ही वह बड़बड़ाया, “GK एक बार हाथ में आ जाए न… मैं छोड़ूंगा नहीं उसे… ब्लडी बास्टर्ड। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर ज़हरीली इतनी कि किष्ना के हाथ काँप जाएँ।
मीनाक्षी ने हल्का-सा भौं सिकोड़ते हुए पूछा, “इतनी आग लग गई… तब तक किसी को पता कैसे नहीं चला?” वो अंदर कैसे गया? किसी ने देखा नहीं? गार्ड्स कहा थे सब?
अक्षत चिड़कर उसकी तरफ देखने लगा, मानो ये सवाल भी उसकी नसों पर चढ़ रहे हों, आप उसे अंदर जाते हुए देखने की बात कर रही हो, मोम? उसने कड़वाहट भरी हँसी छोड़ी।उसे आज तक किसी ने नहीं देखा है। वो आता है…काम करता है… और गायब हो जाता है।
मीनाक्षी हैरानी में पलकें झपकाती रह गईं, क्या? हवा है वो? जो पल में आकर… पल में गायब हो जाता है?”
अक्षत ने माथा दबाते हुए झुँझलाकर कहा, हाँ मोम… हवा ही है वो बन्दा। कहीं से भी घुस आता है… कहीं भी आग लगा देता है… किसी को कुछ समझ नहीं आता।”
फिर उसने तीखी नज़र से किष्ना को घूरा, सीधे उसके चेहरे पर, और इसे लगता है… ये सब काम हलवा है—
बनाया और खा लिया।”
किष्ना की साँस अटक गई। उसने तुरंत सिर झुका लिया, पलकें भी ऊपर उठाने की हिम्मत नहीं हुई। उसके हाथ में पकड़ी चूड़ी की मोती-दोरी हल्के से खनक गई, डर की, असहायता की आवाज़।
मीनाक्षी ने तुरंत किष्ना की ओर देखा, नज़रों में चुपचाप सुरक्षा का एक इशारा, पर आवाज़ नहीं निकली, क्योंकि इस घर में आवाज़ों का वज़न होता था… और किष्ना की आवाज़ का वज़न सबसे हल्का।
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