गोयंका विला,
अक्षत खाते-खाते कुछ न कुछ बड़बड़ाकर अपनी भड़ास निकाल ही रहा था—थाली में रोटी तोड़ते हुए उसका गुस्सा साफ़ दिख रहा था।
तभी तेज़ कदमों की आवाज़ के साथ प्रनीत अंदर आता है। दरवाज़ा धड़ाम से खुलते ही उसकी कड़क आवाज़ पूरे डाइनिंग हॉल में गूंज उठती है, तो लाड़ साहब यहाँ बैठ के आराम से खाना खा रहे हैं… वाह!
अक्षत कुछ कहने को ही था कि प्रनीत हाथ उठाकर बीच में काट देता है, नहीं नहीं, तुम आराम से खाओ। आग लगे बस्ती में और हम अपनी मस्ती में… कुछ भी हो जाए, क्या फ़र्क पड़ता है, है ना?
अक्षत अब और भड़क चुका था। वो कुर्सी पर झुककर गुर्राया, ये सब उस GK ने किया है… एक बार हाथ लग जाए न—साले की चमड़ी और हड्डियाँ अलग करके रख दूँगा!
प्रनीत हल्की हँसी के साथ आँखें रोल करता है और व्यंग्य से भरी आवाज़ में बोलता है, एक ड्रग शिप तुम मेरे बिना निकाल नहीं पाए… उसमें भी वो आकर आग लगा के चला गया। और तुम और तुम्हारे आदमी क्या कर रहे थे? फोन में रील्स देख रहे थे क्या? जो एक GK ना संभाल पाए , gk आया, काम किया और चला गया… और तुम लोगों को पता भी नहीं चला।
वो ताली बजाते हुए होंठ मोड़कर ताना मारता है, वाह… क्या बात है! कमाल कर दिया तुमने अक्षत।
अक्षत दाँत भींचते हुए बोलता है, आपको नहीं पता… कि वो कैसे काम करता है, तो आप खुद भी, वो बात आधी छोड़कर रुक जाता है।
प्रनीत ठहर कर उसकी तरफ झुकता है, आँखें सिकोड़कर, "रुक क्यों गए? अपनी लाइन कम्प्लीट करो… मैं सुन रहा हूँ।"
उसके लहजे में चुनौती थी, दबाव भी… और अक्षत की साँसें तेज हो गईं।
मीनाक्षी माहौल बिगड़ता देख बीच में बोलने की कोशिश करती है, बस "प्रनीत बस करो, अभी!
पर प्रनीत हाथ और आँख के इशारे से उसे तुरंत चुप करा देता है। उसकी नज़रें अब पूरी तरह अक्षत पर टिकी थी, कड़क, तीखी और सवालों से भरी हुई।
"माना कि वो हवा की तरह आता है और हवा की तरह ही गायब हो जाता है…"प्रनीत धीरे-धीरे अक्षत के पास चलता है। वो आग लगा गया… तो तुम सबने फटाक से आग क्यों नहीं बुझाई?
अक्षत सिर झुका लेता है, पर प्रनीत रुकता नहीं। जब पता है कि वो ऐसा कर सकता है, तो तुम लोगों ने एहतियात क्यों नहीं बरती? कितनी बार समझाया है—इस फील्ड में राम कोई नहीं होता। यहाँ हम सब एक जैसे हैं। सामने वाला कब वार कर दे, इसका पता पहले लगाना पड़ता है, बाद में रोने से कुछ नहीं होता।"
फिर वो मीनाक्षी की तरफ देखता है—हल्के से ठंडी मुस्कान के साथ, समझाओ अपने लाडले को… कि नज़र हटी, जान गई। यहाँ कोई किसी का सगा नहीं होता। सबको बस अपने फायदे से मतलब है।"
अक्षत मुट्ठियाँ भींचकर खड़ा रह जाता है, और किष्ना उसके डर से सिर और भी नीचे कर लेती है।
अंदर का माहौल कुछ सेकंड के लिए खामोश हो जाता है। सिर्फ अक्षत की भारी साँसें और किष्ना की घबराहट साफ सुनाई देती है।
अक्षत अचानक कुर्सी पीछे धकेलता है, बस मोम ने ही समझा है मुझे… बाकियों को तो बस ताने मारने हैं।
वो कुर्सी को ठोकर मारते हुए खड़ा हो जाता है। उसकी आँखों में गुस्सा था… और अपमान का ज़हर भी।
प्रनीत ठंडी हँसी हँसता है, गुस्सा मुझपर नहीं… अपने दिमाग की कमी पर कर।”
अक्षत उसका सामना करने के लिए आगे बढ़ता है, पर मीनाक्षी तुरंत बीच में कूद जाती है, अक्षत! नहीं—बस!वो उसके सीने पर हाथ रखकर रोकती है।
अक्षत गुस्से से काँप रहा था, पर माँ के सामने ज़बरदस्ती खुद को रोक लेता है।
प्रनीत घूमकर किष्ना की तरफ देखता है, वो डर से पहले से ही झुकी थी, पर उसकी नज़र उस पर टिकते ही और सिमट जाती है। और तू… इतना सिर क्यों झुका रही है? यहाँ कोई पूजा नहीं हो रही। उसका लहजा कड़क और ठंडा।
किष्ना काँपती आवाज़ में,“जी… व-वो… सॉरी।”
प्रनीत हल्की सी घृणा वाली मुस्कान देता है, इस घर में डरकर रहने से कुछ नहीं होता। जिस दिन GK की आग यहाँ तक पहुँची न… तो रोने का टाइम भी नहीं मिलेगा।”
अक्षत उसकी तरफ घूरकर, GK को मैं खत्म कर दूँगा… देख लेना।
प्रनीत बिना मुड़े बोलता है, पहले खुद को संभाल ले, फिर दुनिया से लड़ने जाना। ये कहकर वो भारी कदमों से बाहर चला जाता है।
अक्षत गुस्से में मुट्ठियाँ कसता है, और किष्ना एक पल को भी ऊपर देखने की हिम्मत नहीं करती।
प्रनीत के जाते ही किष्ना के हाथ काँपने लगे। उसके गले में एक भारी सा दर्द जमा हो गया था। वो प्लेट उठाने का बहाना बनाकर जल्दी से पीछे हटती है, और जैसे ही किचन के पास पहुँचती है, उसकी आँखों से आँसू खुद-ब-खुद गिरने लगते हैं।
वो आवाज़ दबाकर सिसकती है, कभी कुछ गलत नहीं करती… फिर भी सब गुस्सा मुझपर ही क्यों उतरता है…काउंटर पकड़कर खड़ी हो जाती है, कुछ देर बाद वो चुपचाप अपने कमरे की तरफ चली जाती है, धीरे, बिना किसी आवाज़ के।
हॉल में माहौल शांत हुआ, पर अक्षत के अंदर का तूफ़ान और तेज़ हो गया। उसने मुठ्ठियाँ इतने ज़ोर से भींचीं कि नसें उभर आईं।
सब मुझे ही निकम्मा समझते हैं… GK… तुझे पकड़कर फाड़ दूँगा मैं…” तब पता चलेगा सबको की अक्षत गोयंका वो तूफान है जो सब तबाह कर सकता है, वो पास की मेज पर रखी पानी की बोतल उठाता है और पूरी ताकत से दीवार पर पटक देता है, कांच चटककर फर्श पर फैल जाता है।
मीनाक्षी घबरा कर पीछे से आती है। अक्षत, बस कर… पहले दिमाग शांत कर।
अक्षत पीछे नहीं मुड़ता। उसका चेहरा लाल था, साँसें भारी। प्लीज डोंट स्टॉप मी, मोम। इस बार वो मेरे हाथ से नहीं बचेगा… वो अपने रूम की तरफ बढ़ता है, तेज़, बदला लेने वाली चाल… कमरे में जाते ही दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर देता है।
मीनाक्षी अपने आप में बड़बड़ाती है कि कब समझेगा ये की इस फील्ड में गुस्सा नहीं शांति से डिसीजन लेना होता है। “इस फील्ड में पैसा नहीं… दिमाग बचाता है। गलती एक हो, और दुश्मन सौ पैदा हो जाते हैं।” कही ये बना बनाया सब बिगाड़ ना दें।
लाइक और कमेंट्स जरूर करें।

Write a comment ...