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Dogala insan

मोहित तेज़ क़दमों से अवदान के केबिन में आता है। हलक़ी सी दस्तक देते हुए कहता है, “बॉस, आपने कहा था न प्रनीत गोयंका की इनफ़ॉर्मेशन… वो फाइल।” वो फाइल टेबल पर रख देता है।

अवदान अपनी फाइल बंद कर, सिर उठाकर मोहित की ओर देखता है। “ठीक है,” शांत लेकिन भारी आवाज़ में कहता है। वो प्रनीत वाली फाइल उठाता है और वहीं खोलकर पन्ने पलटने लगता है।

गोयंका इंपोर्ट–एक्सपोर्ट कंपनी—ऊपर से एक बिल्कुल साफ-सुथरा, भरोसेमंद बिज़नेस। दो बड़े वेयरहाउस, देशभर में फैला ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क… दुनिया की नज़र में प्रनीत गोयंका एक सादा, मेहनती और स्मार्ट बिज़नेस मैन है, वो जो हर डील में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाता है और मीडिया में हमेशा क्लीन इमेज बनाए रखता है।

लेकिन पर्दे के पीछे उसकी असली दुनिया बिल्कुल उलटी है। इन्हीं वेयरहाउस में रात के बाद अलग ही माल उतरता है, नकली दवाइयाँ, अवैध हथियार और हाई-क्वालिटी ड्रग्स की शिपमेंट। सिर्फ चंद लोग जानते हैं कि उसके ट्रक कंपनियों में सामान के साथ कुछ और भी चलता है, और ये सब इतनी सफाई से होता है कि पुलिस तक भी उसके नाम पर उंगली उठाने से डरती है।

इसी गंदे खेल की वजह से उसका कनेक्शन माफिया वर्ल्ड तक गहरा है, वो बड़ा खिलाड़ी नहीं, लेकिन इतना ज़रूर खतरनाक कि अगर कोई उसकी राह में आए, तो वो बिना नाम छोड़े उसे रास्ते से हटा देता है।

ऊपर से सभ्य, अंदर से गंदगी से भरा यही है प्रनीत गोयंका का असली बिज़नेस।

कुछ ही सेकंड में उसकी भौहें चढ़ जाती हैं। उसके चेहरे का एक्सप्रेशन पूरी तरह बदल चुका था। “तो ये ड्रग्स डीलर है… और माफिया वर्ल्ड में भी हाथ पैर मारता है…” वो नज़र मोहित पर टिकाते हुए पूछता है, लेकिन कभी इसे देखा तो नहीं माफिया पार्टियों में? ये वहाँ होता नहीं है।”

मोहित तुरंत जवाब देता है, हाँ सर, ये कोई बड़ा माफ़िया नहीं है। छोटा-मोटा काम करता है। इसलिए उसे उन पार्टियों में कभी कभी इनवाइट भी नहीं किया जाता। और ऊपर से… आज इसकी ड्रग्स की शिप में आग भी लग गई है।”

अवदान भौंह उठाते हुए कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकता है, “आग लग गई है… या लगाई गई है?” उसकी आवाज़ में शक और दिलचस्पी दोनों थीं।

मोहित हल्का सा सिर हिलाकर कहता है, “जी सर, लगाई गई है। GK ने।”

अवदान की आँखों में हल्की सी धारदार चमक आ जाती है। “हूँ… ये GK जो भी है… काम बड़ा अच्छा किया है।”

मोहित भी हल्का मुस्कुराता है, “सर, लेकिन आज तक उसे किसी ने नहीं देखा है। आता है, अपना काम करता है, और बिना आवाज़ के गायब हो जाता है। और पीछे एक तूफान छोड़ जाता है।

अवदान फाइल बंद करते हुए धीरे से बोलता है, बिल्कुल धुएँ की तरह… कब आया, कब चला गया… पता ही नहीं चलता।

मोहित सहमति में सिर हिलाता है, “हाँ सर, बिल्कुल धुएँ की जैसे।" वो अवदान की ओर देखता है, मानो पूछ रहा हो, अब आगे क्या करें?

अवदान फाइल बंद करते हुए ठंडी साँस छोड़ता है और तिरछी मुस्कान के साथ कहता है, यानी कि जितना घटिया बिज़नेस में है… उतना ही घटिया फैमिली में भी है। दोगला इंसान है।

मोहित तुरंत बोल पड़ता है, जी सर, लेकिन… सिर्फ और सिर्फ किष्ना।

अवदान की निगाह अचानक तेज़ हो जाती है। उसका चेहरा ऊपर उठता है, और वो बिना कुछ बोले मोहित को देखता है।

मोहित तुरंत अपने शब्दों को सुधारता है, “मिन्स… मिस किष्ना। उनके साथ, उनके पेरेंट्स के साथ, और अपनी बीवी-बच्चे के सामने तो बहुत ही अच्छा इंसान बनकर रहता है सर।”

अवदान की तिरछी, कटीली नज़र मोहित पर अटक जाती है, जैसे वो उसकी हर बात में छिपा सच ढूँढ रहा हो।

मोहित हल्का सा घबराते हुए आगे बोलता है, और… मिस किष्ना के पेरेंट्स की डेथ में कुछ तो अजीब है। मैंने इन्फॉर्मेशन निकलवाने को कहा है, लेकिन… टाइम लग रहा है सर।

अवदान फाइल को टेबल पर रखते हुए सिर हिलाता है।“ठीक है।”

उसके चेहरे पर एक सख्त, दबा हुआ शक साफ दिख रहा था, जैसे उसे पहली बार किष्ना के आस-पास की अंधेरी कहानी का सिरा पकड़ में आया हो।

सुबह की हल्की ठंडी हवा थी। किष्ना सफ़ेद सूती दुपट्टा ठीक करते हुए मंदिर के लिए निकली ही थी कि अचानक गाड़ी से अजीब सी आवाज़ आई और वो झटके से रुक गई।

ड्राइवर बोनट खोलकर देखता है और जल्दी से कहता है, मेडम… गाड़ी खराब हो गई है।”

किष्ना बिना नाराज़ हुए बस हल्का सा मुस्कुराकर बोलती है, कोई बात नहीं, मंदिर पास में ही है। मैं चलकर चली जाऊँगी।

ड्राइवर कहता है, ठीक है मेडम, मैं अभी दूसरी गाड़ी लेकर आता हूँ। आप मंदिर पहुँच जाइए।

किष्ना सिर हिलाकर ठीक है का इशारा देती है और शांत कदमों से पगडंडी की तरफ बढ़ जाती है। धीमी हवा में उसके दुपट्टे का किनारा उड़ रहा था, और चेहरे पर वही हमेशा वाली थकान जो सिर्फ ध्यान से देखने वाला ही पकड़ सकता था।

वो मंदिर की ओर जाने ही वाली थी कि सड़क पर एक काली SUV आकर ठीक उसके पास रुकती है। खिड़की धीरे-धीरे नीचे होती है।

कृष्णा पलटकर देखती है, और उसकी साँस एक पल को थम जाती है।

SUV के अंदर अवदान बैठा था। तीखी निगाहें, सधा हुआ चेहरा, और उसके देखने का तरीका… जैसे वो सिर्फ उसे नहीं, उसके अंदर तक पढ़ रहा हो। SUV से अवदान दरवाज़ा खोलकर बाहर आता है। उसकी नजर सीधी किष्ना पर टिक जाती है, जैसे एक पल में उसने उसकी थकान, उसका डर, और उसके भीतर का बोझ सब पढ़ लिया हो।

हल्के से भौंह उठाकर वो पूछता है, “मंदिर जा रही हो?”

किष्ना तुरंत सिर झुकाकर हाँ में हिला देती है। उसका उत्तर हमेशा की तरह छोटा, धीमा और विनम्र था।

अवदान बिना ज़्यादा कुछ कहे बस दरवाज़ा खोलता है,

“मैं छोड़ देता हूँ… आइए।”

किष्ना तुरंत घबराई सी पीछे हटती है, “न… नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं है। पास ही है, मैं चलकर चली जाऊँगी। आप फ़िक्र मत कीजिए… आपको तकलीफ़ लेने की ज़रूरत नहीं है।”

अवदान उसके इनकार पर हल्का सा सिर तिरछा करता है, जैसे उसे उसकी ज़िद की वजह समझ आ रही हो।

फिर शांत लेकिन सख्त लहजे में कहता है, “मैं वही जा रहा हूँ—भोग देने। इसीलिए कहा है। वरना मैं नहीं कहता… किसी को भी छोड़ने।”

उसके कहने का अंदाज़ ऐसा था कि किष्ना कुछ और बहाना नहीं बना पाती। वो चुपचाप हाँ में सिर हिला देती है और SUV का पिछला दरवाज़ा खोलकर बैठ जाती है।

अगले ही पल अवदान ड्राइवर सीट पर बैठता है, चाबी घुमाता है, और गाड़ी स्मूदली आगे बढ़ जाती है, मंदिर की ओर।

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Desire ruksi

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